कलम के सिपाही मुंशी जी आज 136 वर्ष के हो गये

(Last Updated On: जनवरी 1, 2017)

136 साल के हुए उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी

हिन्दी साहित्य के इतिहास मे उपन्यास सम्राट कहलाए जाने वाले मुंशी प्रेमचंद जी आज 31 जुलाई 2016 को 136 साल के हो गये है. एक नज़र मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन काल पर…

मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 के दिन वाराणसी के निकट “लमही” गाँव मे हुआ था| प्रेमचंद जी का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था.  हिन्दी भाषा को एक नयी पहचान दिलाने वाले मुंशी जी ने 19वी सदी के अंतिम दशक से 20वी सदी के तीसरे दसक तक एक महान साहित्यकार, नाटककार, और उपन्यासकार के रूप मे अपनी पहचान बनाई.

इस कालखंड मे तकनीकी सुविधाओ के अभाव मे भी हिन्दी साहित्य को दिया गया उनका योगदान अतुलनीय है, मुंशी जी ने समाज मे फैली अव्यवस्थता और सामाजिक बुराइयो के खिलाफ अपनी कलम से लड़ाई लड़ी| देश की स्वतन्त्रता को समर्पित मुंशी जी ने चौरी चौरा कांड के चार दिन बाद ही सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर सक्रिय रूप से लिखना शुरु कर दिया था|

छायावाद के दौर मे लेखनी की शुरुवात करने वाले मुंशी प्रेमचंद जी ने निराला, महादेवी वेर्मा, प्रसाद और पंत जी जैसे दिग्गज रचनाकारो के बीच अपनी पहचान बनाई.

उन्होने सामाजिक मुद्दो जैसे छुआ-छूत, हिंदू मुस्लिम साम्प्रदायिकता दलितो के प्रति हो रहे अन्याय जैसे ज्वलंत मुद्दो पर अपनी चिंताए व्यक्त की|

अपनी कहानियो के ज़रिए उन्होने यातना और ग़रीबी से जुझ रहे इस दौर मे भी हार ना मानने की शिक्षा दी, उनके किरदारो मे हार ना मानने की प्रवृति और संघर्षो के बीच भी अंतत: सफल होने की भावना होती थी|

सदा मस्त रहने वाले मुंशी जी का जीवन बहुत ही सादा और सरल था, और उतनी ही सरल है उनकी लेखनी| विषमताओं से भरे जीवन मे भी वे सदा प्रसन्न रहा करते थे|

वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उन्होने अपनी रचना दृष्टि विभिन्न साहित्यो के माध्यम से व्यक्त की है| मुंशी जी जन साधारण की भावनाओं और समस्याओं के सन्दर्भ मे लिखते रहे, भारतीय साहित्य की सर्वाधिक विस्तृत कृतीया प्रेमचंद जी द्वारा ही लिखित है|

मुंशी जी ने उपन्यास, नाटक, कहानी, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण और समीक्षा जैसी अनेक विधाओ मे लेखनी की है| उनकी कुछ महत्पूर्ण रचनाए जैसे कर्मभूमि, गोदान, कर्बला, गबन, रंगभूमि, पूस की रात, बडे भाई साहब हिन्दी साहित्या की अनमोल रचनाये है|

हिन्दी साहित्य को दिए गये अमूल्य योगदान और अपनी रचनाओ से हिन्दी को एक नया रूप और नयी पहचान देने वाले मुंशी जी अपनी रचनाओ और लेखनी के ज़रिए हमेशा जीवित रहेंगे|

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