जितने सरल उतने ही जटिल है भोजपुरी भाषा के महान रचनाकार – भिखारी ठाकुर


जितने सरल उतने ही जटिल है भोजपुरी भाषा के महान रचनाकार - भिखारी ठाकुर 1
(Last Updated On: मार्च 22, 2017)

जितने सरल उतने ही जटिल है भोजपुरी भाषा के महान रचनाकार – भिखारी ठाकुर

एक आम आदमी के सतह से शिखर तक की बेजोड़ मिसाल हैं भिखारी ठाकुर! बहुत कम लोग होते हैं जो जीते-जी विभूति बन जाते हैं… दरअसल, इस भिखारी ठाकुर की जीवन-यात्रा भिखारी से ठाकुर होने की यात्रा ही है…फर्क सिर्फ यह है कि लीजेंड बनने की यह यात्रा भिखारी ने किसी रुपहले पर्दे पर नहीं असल ज़िंदगी में जिया ।

भोजपुरी के नाम पर सस्ता मनोरंजन परोसने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है, जितना भोजपुरी का इतिहास….18 दिसंबर 1887 को छपरा के कुतुबपुर दियारा गांव में एक निम्नवर्गीय नाई परिवार में जन्म लेने वाले भिखारी ठाकुर ने विमुख होती भोजपुरी संस्कृति को नया जीवन दिया, उन्होंने भोजपुरी संस्कृति को सामीजिक सरोकारों के साथ ऐसा पिरोया कि अभिव्यक्ति की एक धारा भिखारी शैली जानी जाने लगी…आज भी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का सशक्त मंच बन कर जहाँ-तहाँ भिखारी ठाकुर के नाटकों की गूंज सुनाई पड़ ही जाती है ।

भिखारी ठाकुर का पूरा रचनात्मक संसार लोकोन्मुख है। उनकी यह लोकोन्मुखता हमारी भाव-संपदा को और जीवन के संघर्ष और दु:ख से उपजी पीड़ा को एक संतुलन के साथ प्रस्तुत करती है। वे दु:ख का भी उत्सव मनाते हुए दिखते हैं । वे ट्रेजेडी को कॉमेडी बनाए बिना कॉमेडी के स्तर पर जाकर प्रस्तुत करते हैं। नाटक को दृश्य-काव्य कहा गया है । अपने नाटकों में कविताई करते हुए वे कविता में दृश्यों को भरते हैं ।

उनके कथानक बहुत पेचदार हैं- वे साधारण और सामान्य हैं, पर अपने रचनात्मक स्पर्शों से वे साधारण और बहुत हद तक सरलीकृत कथानक में साधारण और विशिष्ट कथ्य भर देते हैं। वह यह सब जीवनानुभव के बल पर करते हैं। वे इतने सिद्धहस्त हैं कि अपने जीवनानुभवों के बल पर रची गई कविताओं से हमारे अंतरजगत में निरंतर संवाद की स्थिति बनाते हैं ।

दर्शक या पाठक के अंतरजगत में चल रही ध्वनियां-प्रतिध्वनियां, एक गहन भावलोक की रचना करती हैं। यह सब करते हुए वे संगीत का उपयोग करते हैं। उनका संगीत भी जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों से उपजता है और यह संगीत अपने प्रवाह में श्रोता और दर्शक को बहाकर नहीं ले जाता, बल्कि उसे सजग बनाता है ।

भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर ने अपनी नाट्य शैली से समाज की कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया । वहीं, लोगों को जागरूक करने में भी भिखारी ठाकुर की महत्वपूर्ण भूमिका रही. लोक कलाकार भिखारी ठाकुर नवजागरण की उन्नत अवस्था के बेहद लोकप्रिय कलाकार थे ।

उनमें जनता के दर्द को समझने की अद्भुत क्षमता थी, अपने नाटकों के माध्यम से बाल विवाह, रोजगार के लिए पलायन, नशाखोरी जैसी कुरीतियों पर प्रहार करनेवाले भिखारी ठाकुर का जन्म सदर प्रखंड के कुतुबपुर दियारा स्थित कोटवा पट्टी गांव में 18 दिसंबर, 1887 को हुआ था ।

भिखारी के नाम पर हुए काम

बिहार राज्य भाषा परिषद् ने भिखारी की  सभी रचनाओं का संकलन भिखारी ठाकुर रचनावली के नाम से प्रकाशित किया है  । लोकप्रिय गायिका कल्पना ने भी भिखारी के आठ गीतों को ‘लिजेंट ऑफ भिखारी ठाकुर’ नामक अलबम में गाया है  ।

राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें भोजपुरी का अनपढ़ हीरा कहा. जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा सहित कई विश्वविद्यालयों में भोजपुरी की पढ़ाई शुरू होने के साथ भिखारी ठाकुर की रचनाओं को सिलेबस में शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है. भोजपुरी नाटकों पर आधारित फिल्में भी प्रदर्शित होने लगी है ।

 भिखारी ठाकुर के मायने

“ठनकता था गेंहुअन
तो नाच के किसी अँधेरे कोने से
धीरे-धीरे उठती थी
एक लंबी और अकेली
भिखारी ठाकुर की आवाज़”

कवि केदारनाथ सिंह की यह पंक्तियाँ भोजपुरी और पूरे पुरबियों के बीच भिखारी ठाकुर की लोकप्रसिद्धि का बयान ही है. प्रख्यात रंग-समीक्षक हृषिकेश सुलभ ने भी भिखारी ठाकुर की आवाज़ को ‘अधरतिया की आवाज़’ कहा है. जब भी भोजपुरी संस्कृति और कला-रूपों पर बात होती है, भिखारी ठाकुर का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है ।

भोजपुरी के एक कवि शिवनंदन भगत, जो भिखारी ठाकुर के ही सामयिक थे, ने उनके विरोध में एक कविता भी लिखी :

 “जाति के हजाम भईले, पेशा के नापाक कईले
हिजरा के गिनती में गईले भिखरिया
दोकड़ा के सेंदुर अवसर, बुढ़िया बनके नाच कईले
रोपेया में इज्जति गँववले भिखरिया.”

कलाकार अथवा साहित्यकार अपने समय-समाज से निरपेक्ष होकर सर्जना-रचना नहीं कर सकता. एक उत्कृष्ट और जागरूक रचनाकार की कलम अपने देश-काल की परिस्थितियों का बयान दर्ज करती है, जिससे कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियाँ अपने उस लोक-सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश की उन सच्चाईयों से रु-ब-रु हो सके, जो उस समाज और समय में व्याप्त हो ।

भिखारी ठाकुर भी पाने समय के ऐसे ही सर्जक, भोक्ता थे, जिन्होंने अपने समय की सामंती मानसिकता, जातिवादी सोच, वर्ग-विभेद की राजनीति, श्रमिक संस्कृति, पलायन और पीछे रह गयी प्रोषितपतिकाओं की वेदना को प्रत्यक्षतः देखा ही नहीं बल्कि सामियाने के बीचो-बीच मंचासीन होकर उन सवालों से दो-दो हाथ करने की प्रेरणा भी दी. रंगकर्म जनवादी कला है और भिखारी ठाकुर मूलतः प्रगतिशील, जनवादी  रंगकर्मी/कलाकार थे.

ऐसे प्रगतिशील सर्जकों को लोक यूँ ही नहीं छोड़ देता उसके लिए भी यथास्थिति की पोषक शक्तियाँ कई दुश्वारियाँ पैदा करती हैं, पर सोना आग में तप के और निखरता है. यह बात भिखारी ठाकुर पर अक्षरशः लागू होती है. कई दफे यह स्थितियाँ होती हैं, कि उस कलाकार/सर्जक का मूल्यांकन उसके समय में नहीं हो पता है. इसके कई कारण हो सकते है. भिखारी ठाकुर की स्थिति भी इससे भिन्न तनिक थी.

यद्यपि दिक्कतें भिखारी से थीं पर  भिखारी ठाकुर को उस समय के प्रगतिशील शक्तियों ने पहचाना और विभिन्न उपाधियों-विशेषणों यथा ‘अनगढ़ हीरा’, ‘भोजपुरी के शेक्सपियर’,’भोजपुरी के भारतेंदु’ आदि से नवाजा. पर सामंती ताकतें गाल बजाने में ही मशगूल रहीं और उन्हें एक नचनिया, लौंडा नाच करने वाला ही मानती रही ।

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भिखारी ठाकुर बीसवीं शताब्दी के लोक कलाकार थे, जिसने वैश्विक प्रसिद्धि और ऊँचाईयाँ पाई. सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ मशाल उठाने वाले इस कलाकार/रचनाकार पर अपने पारंपरिक मूल्यों की भी छाप थी. वे अपने विरासत में मिले इन मूल्यों के बावजूद जड़ता के, यथास्थितिवाद के पैरवीकार न होकर प्रयासों में खालिस प्रगतिशील थे. नाच मंडली से जीवन यापन और उसी नाच के मंच से कबीर की भांति अपने कुशल अभिनय से उस सामंती समाज का नकली चेहरा सबके सामने ले आते थे. हालांकि भिखारी ठाकुर का परिवेश भी मध्यकालीन समाज-व्यवस्था से बहुत अलग नहीं था.

भिखारी ठाकुर जिस तरह के जातिगत संरचना से आते थे, वहाँ इस पूरी दकियानूसी सिस्टम से सीधे-सीधे दो-दो हाथ करना भिखारी ठाकुर के लिए संभव नहीं था. अतः इस व्यवस्था से टकराना या इस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना एक कूटनीतिक चतुराई वाले प्रयास की माँग करता था और भिखारी ठाकुर जैसा कलाकार इस खेल का महारथी था. उन्होंने बड़े ही चतुराई से इस व्यवस्था को उसके बनाये मंच से चुनौती दी. जनप्रिय कलाकार के मुँह से अपने पर पड़ती चोट से यह तंत्र तिलमिलाने के अलावा कर ही क्या सकता था.

आज जब भिखारी ठाकुर हमारे बीच नहीं हैं, तब उनके लिखे-खेले नाटक आज के नए विमर्शों के मध्य और भी प्रासंगिक हो उठे हैं. भिखारी ठाकुर का समय औपनिवेशिक समय था, आज उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी भिखारी ठाकुर के उठाए प्रश्न हमारे समाज में विद्यमान हैं, चाहे वह दलित वर्ग से सम्बंधित हों या स्त्रियों का पक्ष. आज भी इन प्रश्नों से जूझते बड़े समाज की ओर किसकी दृष्टि है?

जिन श्रमिकों का बड़ा चित्रण भिखारी ठाकुर ने किया, उनकी कोई जाति नहीं थी. सब पूरब के बेटे हैं, जो आज भी पलायन को मजबूर हैं और घर में पीछे रह गयीं औरतें रोने को मजबूर हैं. हमारे बड़े प्रजातंत्र के नीति-नियंता कहाँ हैं? श्रमिक संस्कृति का इतना बड़ा चितेरा भारतीय साहित्य में दिखाई नहीं देता, जिसके प्रश्नों का जवाब आज तक अनुत्तरित है.

भिखारी ठाकुर की मुख्य रचनाएँ एवं लोकनाटक

  • बिदेशिया
  • भाई-बिरोध
  • बेटी-बियोग या बेटि-बेचवा
  • कलयुग प्रेम
  • गबर घिचोर
  • गंगा स्नान (अस्नान)
  • बिधवा-बिलाप
  • पुत्रबध
  • ननद-भौजाई
  • बहरा बहार
  • कलियुग-प्रेम
  • राधेश्याम-बहार
  •  बिरहा-बहार
  • नक़ल भांड अ नेटुआ के


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