कौन थे गाजीपुर के वीर अब्दुल हमीद?


कौन थे गाजीपुर के वीर अब्दुल हमीद? 1
(Last Updated On: अप्रैल 5, 2018)

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कौन थे गाजीपुर के वीर अब्दुल हमीद?

वीर अब्दुल हमीद एक ऐसा नाम जिन्होंने अपने सेवा काल में सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल और रक्षा मेडल से सम्मान प्राप्त किया था। १९६५ युद्ध में पाकिस्तानी सेना के अपराजेय माने जाने वाले पाकिस्तानी पैटर्न टैंको की धज्जियां उड़ा दी थी। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में असाधारण बहादुरी के लिए महावीर चक्र और परमवीर चक्र प्राप्त हुआ।

तो आइये जानते हैं वीर अब्दुल हमीद की जीवनी विस्तार से-

वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश में ग़ाज़ीपुर ज़िले के धरमपुर नामक गांव में एक मुस्लिम दर्जी परिवार में 1 जुलाई, 1933 को हुआ। आजीविका के नाम पर कपड़ों की सिलाई का काम करने वाले मोहम्मद उस्मान के पुत्र अब्दुल हमीद की रूचि शुरुवात से ही सैन्य बल की तरफ ही थी,वो अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए सैन्य सेवा से जुड़ना चाहते थे।

अब्दुल हमीद बचपन से ही कुश्ती के दाँव पेंचों में अत्यंत रूचि रखते थे कुश्ती के साथ ही लाठी चलाना, कुश्ती का अभ्यास करना, नदी को पार करना, गुलेल से निशाना लगाना, एक ग्रामीण बालक के रूप में इन सभी क्षेत्रों में अब्दुल हमीद पारंगत थे।

अब्दुल हमीद बचपन से ही पराक्रमी तथा दुसरो की सहायता के लिए सदा अग्रसर रहने वाले बालक के रूप में प्रख्यात थे। अब्दुल हमीद के बारे में एक किस्सा मशहूर था कि,एक बार जब किसी ग़रीब किसान की फसल बलपूर्वक काटकर ले जाने के लिए जमींदार के ५०-६० के लगभग गुंडे उस किसान के खेत पर पहुंचे तो अब्दुल हमीद ने अकेले ही उन सबको वहाँ से खदेड़ दिया तथा सभी गुंडे वहाँ से भाग खड़े हुए।

सेना में भर्ती-

२१ वर्षीय अब्दुल हमीद ने २७ दिसंबर, १९५४ को ग्रेनेडियर्स इन्फैन्ट्री रेजिमेंट में शामिल किये गये थे। जम्मू कश्मीर में तैनात अब्दुल हमीद एक बार जब आतंकवादी इनायत अली को पकड़वाया तो प्रोत्साहन स्वरूप उनको प्रोन्नति देकर सेना में लांस नायक बना दिया गया।

1962 में जब चीन ने भारत की पीठ में छुरा भोंका तो अब्दुल हमीद उस समय नेफा में तैनात थे, उनको अपने अरमान पूरे करने का विशेष अवसर नहीं मिला। उनका अरमान था कोई विशेष  पराक्रम दिखाते हुए शत्रु को मार गिराना। ज्यादा समय नही बिता और 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अब्दुल हमीद ऐसे ही अवसर की प्रतीक्षा में थे, जब वो अपनी मातृभूमि हेतु अपना कर्तव्य निभा सके।

10 सितम्बर 1965 को जब पाकिस्तान की सेना अमृतसर को घेर कर उसको अपने नियंत्रण में लेने को तैयार थी, अब्दुल हमीद ने पाक सेना को अपने अभेद्य पैटन टैंकों के साथ आगे बढ़ते देखा। अब्दुल हमीद ने अपनी तोप युक्त जीप को टीले के समीप खड़ा किया और गोले बरसाते हुए शत्रु के तीन टैंक ध्वस्त कर डाले। अब्दुल हमीद ने जैसे ही दुश्मनो के एक और टैंक को समाप्त करने की कोशिश की तभी दुश्मन की गोलाबारी से वो शहीद हो गये। अब्दुल हमीद का शौर्य और बलिदान ने सेना के शेष जवानों में जोश का संचार किया और दुश्मन को खदेड दिया गया।

वीर अब्दुल हमीद ने अपनी अद्भुत वीरता से पाकिस्तानी शत्रुओं के खतरनाक, कुत्सित इरादों को तो ध्वस्त करते हुए अपना नाम इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में अंकित कराया। मरणोपरांत उनको सबसे बड़े सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो उनकी पत्नी श्रीमती रसूली बीबी ने प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त भी उनको समर सेवा पदक, सैन्य सेवा पदक और रक्षा पदक प्रदान किये गए।

सम्मान –

28 जनवरी 2000 को भारतीय डाक विभाग द्वारा वीरता पुरस्कार विजेताओं के सम्मान में पांच डाक टिकटों के सेट में 3 रुपये का एक सचित्र डाक टिकट जारी किया गया। इस डाक टिकट पर रिकाईललेस राइफल से गोली चलाते हुए जीप पर सवार वीर अब्दुल हामिद का रेखा चित्र उदाहरण की तरह बना हुआ है।

1965 युद्ध में असाधारण वीरता के लिए वीर अब्दुल हामिद को पहले महावीर चक्र और फिर सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। आज भी समस्त भारतीय उनकी बहादुरी को प्रणाम करता है।


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